Karneshwar mahadev

  कर्णेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास



                            





1. निर्माण काल और शिलालेख

इस मंदिर के अंदर संवत 1275 (लगभग 1218 ईस्वी) का एक शिलालेख पाया गया है।


इसका मतलब है कि मंदिर कम से कम 800 साल पुराना है।


यह शिलालेख इस बात का प्रमाण है कि उस समय यह क्षेत्र धार्मिक रूप से सक्रिय था और शिव पूजा यहाँ प्रमुख थी।




2. स्थापत्य शैली


मंदिर का स्थापत्य मालवा की प्राचीन नागर शैली से मेल खाता है।


इसमें पत्थरों की नक्काशी और स्थानीय कारीगरी का असर देखने को मिलता है।


पास के अन्य प्राचीन शिवालयों की तरह इसका शिखर भी साधारण परन्तु दृढ़ संरचना लिए है।




3. स्थानीय मान्यता


माना जाता है कि यह मंदिर कर्णावद (कर्णावाड) नगर की पहचान है और यहाँ का नाम भी कर्णेश्वर महादेव से जुड़ा है।


आसपास के गाँवों में इसे "चमत्कारी शिवालय" कहा जाता है।


श्रावण मास, महाशिवरात्रि और नागपंचमी पर यहाँ विशेष मेला व पूजा होती है।




4. धार्मिक महत्व


यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं बल्कि कर्णावद नगर का सांस्कृतिक केंद्र भी है।


पुराने समय में आस-पास के गाँवों के राजा-महाराजा और ज़मींदार यहाँ आकर पूजा करते थे।


लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि यहाँ की शिवलिंग स्वयंभू (स्वतः प्रकट) है।




मंदिर लगभग 800 साल पुराना है।


इसके शिलालेख से मालूम होता है कि यह 13वीं शताब्दी से मौजूद है।


यह नागर स्थापत्य शैली में बना हुआ प्राचीन शिव मंदिर है।


श्रावण मास और महाशिवरात्रि को यहाँ बहुत भीड़ रहती है।


आसपास के गाँवों में इसे आस्था और चमत्कार का प्रतीक माना जाता है।


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